background
तेरा ज़िक्र September 17, 2012

तेरा ज़िक्र

tera_zikra_banner

आज करके तेरा ज़िक्र कोई
फ़िर सारे ज़ख्म कुरेद गया
रेशा – रेशा करके
सालों लगे जिन्हें सिलने में
एक पल में ही कोई
हर इक क़तरा उधेड़ गया

क्या कहा सुना माना जाना
सोचते इन बातों को
रात यूँ ही रोती रही
और सहर की आस में
कोने में रखी शमा
ख़ामोश सिसकती रही,

क्या तुम्हे भी कभी
मन का सियह वो कोना
रातों को कचोटता है
और अतीत की धूल तले
दबी हुई उन परतों को
कोई यूँ ही बिखेरता है,

क्या किसी सुबह अचानक उठ कर
तुम भी इस चेहरे को ज़हन से
मिटाने की कोशिश करते हो
और फ़िर अनायास ही
मेरी सलामती की दुआ करते हो
या तुमने जीना सीख लिया है?


11 Comments

Bhelcome to Dilli May 24, 2012

Bhelcome to Dilli

bhelcome-to-delhi

“This is the last and final call for IndiGo flight no 6E-122 to Delhi. This is the last and final call. Repeat this is the last and final call for IndiGo flight no 6E-122 to Delhi.”

I was just sitting in the Coffee Day of the waiting lounge trying to take a sip of a coffee, feeling reluctant to move out of the couch and proceed to the boarding gate. The coffee in hand probably already had cried, cursed, cooled down and was dead by now. I was still a bit nervous. Flying has never before given me the butterflies in the stomach (more…)


2 Comments

मंझधार April 16, 2012

मंझधार

manjhdhaar

निर्मम, निष्ठुर, निर्मोह लगत है
अब यह जीवन-धार

माया तृष्णा अहं में लिप्त चिर
रहे काम मदमात

अंखियन से कबहूँ देखा ना
लालसा के पार

प्रीत, स्नेह, अपनत्व भूल
अंसुवन दिए अपार

निज बोये, निज ही दुःख काटे
पर दोष धरे संसार

अजब पहेली अजब है खेला,
ये जीवन मंझधार

हिय में जैसे फाँस लगत है
अब रह गए पल बाकी जब चार

हाय सखी अब पार है जाना
कुछ तो कर लूं श्रृंगार


4 Comments

घुटन March 6, 2012

घुटन

ghutan

बेखौफ़ हवा बन बह निकलें
पेड़ों की टहनी को तोड़ें
और डगमगाते क़दमों से
पत्तियों को रोंदे हम
घोंट दें अहसासों को,

पत्थर से मारें
रोशनदान में बने उस घोंसले को
कबूतरों ने कुछ अंडे
जहां हैं सहेज रखे हुए
तोड़ दें विश्वासों को,

या निकलें हम घर से नंगे पांव
चलते रहें अनवरत
उस तपती हुई सी रेत में
राख कर लें इन पैरों को
और भस्म कर दें ये घुटन,

खुरच दें इस साए को ज़मीं से
या नोच लें अपने जिस्म से इसको
दफना दें इसको भी रेत में
क्यूँ है हर पल साथ रहता
कमबख्त कहीं भी जाके मर,

शून्य में भी देखें अगर तो
लगता है अजब सा एक डर
अट्टाहास करता एक दानव
प्रतिबिम्ब सा एक आईने में
आता है हमको नज़र,

तोड़ते उस आईने को
तो हर एक टुकड़ा
चींटियों के इक झुंड सा
चीरता हुआ रगों को
आता है आँखों में उतर,

किस तरह शीशे की चुभन
इन आँखों से बहायें हम
क्या करें कि जी जाएँ
और फिर से इन्सां बन जाएँ हम
या फिर मर ही क्यों ना जाएँ हम


3 Comments

माँ November 22, 2011

माँ

नित्य की निरंतर आपाधापी के बीच
आज सहसा यादों की
एक आंधी सी बह आई
मेरे घर से निकलते समय
तेरे उन बेवज़ह आंसुओं की
वजह समझ में आई
माँ, आज तेरी बहुत याद आई,

संदूक में रखी तेरी साड़ी से
अब भी वही भीनी सी खुशबू आती है
साड़ी के पल्लू में लगी वो गाँठ
और उसमे बंद वो बचपन की खुशियाँ
जिन्हें मैं अक्सर चुपके से खोलने की सोचता था
आज फिर तेरे पल्लू की उस गाँठ से
कुछ खुशियाँ खोलने की ख्वाहिश आई,

आज मन है जी भर के
तेरी गोद में सर रख के सोने का
या तेरे उस आँचल में
छुप कर थोड़ा सा रो लेने का
जीवन की इस दहकती धूप में
तेरी थपकियों की याद ही
जैसे एक ठंडी बयार लाई,

तेरा अनवरत प्यार
निश्छल, निर्विघ्न दुलार
और तेरा आशीष सदा से मेरा हमसाया है
दूर कहाँ है,
मेरे हर रोम में तेरा ही तो अंश समाया है
कहा नहीं कभी, पर आज भावनाएं खुद को रोक ना पाईं
माँ, आज तेरी बहुत याद आई।


5 Comments

टूटा हुआ सा… November 17, 2011

टूटा हुआ सा…

toota-hua-sa

क्यों निरर्थक याद में तुम आह भरते जा रहे
निर्जीव धूसरित पात बन पथ में पड़े मुर्झा रहे

बिसरी सी वो टहनी जिससे तुम टूट के थे गिर पड़े
वो न रोती है, नये कोपल हैं उसमे आ रहे

क्यों अतीत की अग्नि को सीने से लगा रखते हो तुम
उस आंच में तुम आज को क्यों राख करते जा रहे

उठ जाओ हर झोंका हवा का तुमसे यही है कह रहा
हाथ थामो, उड़ चलो नई मंजिल की ओर अब तुम ज़रा

गिरते तो सब ही लोग हैं, गिरकर ना उठना हार है
तम बरसता आज तो, कल अरुण किरण बौछार है

इस पात को कोई लहर कभी तो कहीं अपनाएगी
जब तक ना रोका नियती ने वो संग बहती जायेगी

ऐ मन इस जीवन में कई ऋतुएँ अभी हैं देखना
हर एक ऋतु में नियती की करवटें कई हैं देखना

फिर क्यों निरर्थक याद में तुम आह भरते जा रहे
निर्जीव धूसरित पात बन पथ में पड़े मुर्झा रहे


2 Comments

दीप जलाओ October 26, 2011

दीप जलाओ

deep-jalaao

दीप जलाओ,
मंगलमय दिवस है आज,
घर-आँगन रोशन कर जाओ

मात-पिता, निज अनुज सखा संग
सुख-समृद्धि की कामना कर,
खुशियों का ये जश्न मनाओ

आज ढूँढो वो आला अन्दर का
अंतर्मन की उस गहन गुफा का,
जहां अभी भी तम बाकी है

एक दिया तुम और जलाओ
मन के उस आले में रख आओ
प्रेम और सहिष्णुता से मन को भी रोशन कर जाओ।

 

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!!


1 Comment

चार आने का सुकून October 12, 2011

चार आने का सुकून

chaar-aane-ka-sukoon

ए माई दे द एगो चवन्निया, हाट जाइब कीनब बजनिया
ए ईया द ना एगो चवन्निया, हाट जाइब कीनब बजनिया

बचपन में जब हम गाँव में रहते थे तब ये पंक्तियाँ मैं अक्सर गाता रहता था। यदा-कदा माई(माँ) या ईया(दादी) हमारे हाथों में एक चवन्नी रख दिया करते थे। उन दिनों एक चवन्नी मिलना जैसे सारी खुशियों का मिल जाना होता था और संसार उस एक चवन्नी में जैसे पूरा भर जाता था। (more…)


1 Comment

शायद वह एक स्वप्न था October 5, 2011

शायद वह एक स्वप्न था

shaayad

अक्सर स्मृतियाँ अवचेतन से निकल कर चेतना को मदहोश कर देती हैं
और नींद के अँधेरे में डूबे मानसपटल के स्याह कैनवास पर
कल्पनाओं के साथ मिलकर रंग भरने लगती हैं,

अबाध कल्पनाएँ, वर्तमान और यथार्थ से परे
अपनी ही धुन में, सही और गलत के बोध से बेपरवाह
और तितलियों के पंखों जैसे रंग, उड़ने को आतुर,

उड़ते हुए, खुशियों से भरे वो रंग
बादलों की तरह मिलकर बन जाते हैं एक चेहरा
जिसकी सुरमई आँखें टकटकी लगाए हों मेरी तरफ,

पुलकित मन, उस चेहरे का श्रृंगार करता है
स्नेह का काजल, अनुराग की अरुणिमा, प्रीत की बिंदी
और आकांक्षाओं की निशिगंधा से सजाता है

और फिर सहसा उन आँखों में सदियों से ठहरा हुआ एक बाँध टूट गया जैसे
धुंधला गया काजल, स्याह हुई वो अरुणिमा
बह गई बिंदी और डूब गई निशिगंधा भी,

और तब डूबती हुई मदहोश सी चेतना कसमसाती है,
उठ पड़ती है और ये दिलासा देती है
की ये तो बस एक स्वप्न था,

फिर क्यों सर्द कोहरे की तरह ये वेदना सी छा गयी है
और क्यों मेरी इन आँखों में ये गिलावट सी आ गयी है
…शायद उस टूटे बाँध का कुछ पानी रह गया होगा।


No Comments

विडम्बना August 23, 2011

विडम्बना

vidambana

एक दर्द की लहर सी उठती है
अचानक, दबे पाँव, पता नहीं कहाँ से
नसों में जैसे समा जाती है
और मैं दिन में भी रात को ओढ़े
धीरे-धीरे सुलगने लगता हूँ,
विडम्बना यह है कि
कमबख्त ये दर्द भी
तुम्हारे अपनत्व की नर्म छुअन से ही
ठीक होता है,
जानता हूँ मेरी नसों की हर एक करवट
तुम पल भर में समझ जाती हो
फिर भी मैं हंसने लगता हूँ,
इस डर से कि कहीं तुम इस दर्द को
महसूस करके इसे छू न लो
और वो लहर कहीं
तुम्हारी नसों में भी ना चली जाए।


1 Comment

हम स्वतंत्र हैं August 15, 2011

हम स्वतंत्र हैं

hum-swatantra-hain

आज स्वतंत्रता दिवस है
सुबह उठे, तैयार हुए और घर से निकले
तेज दौड़ती सड़क पर चल पड़े,
नहीं… तेज दौड़ते हम लोग, सड़क तो स्थिर है
अपनी मंजिल पर पहुँचने की जल्दी में
एक लावारिस कुत्ते की तरह एक दूसरे की भावनाओं को रोंदते हुए
जहां रोंद न सके वहाँ हॉर्न से दूसरों पर चिल्लाते हुए
सहनशीलता को तो किसी अनजान सड़क पर
कब के छोड़ आये हैं हम शायद

रास्ते में एक छोटी सी बच्ची, मैले से कपड़ों में, नंगे पांव
अपने छोटे से हाथों में खूब सारे तिरंगे लिए
दस रुपये में एक बेच रही थी,
और वहीं उसका भाई दो रुपये में गाड़ी साफ़ कर रहा था
हमने भी एक तिरंगा खरीदा, गाड़ी चमकवाई
और देश के उस भविष्य के हाथों में पचास रूपये रख दिए,
अपने बारे में कुछ अच्छा महसूस कर,
और अपने तुच्छ स्व के कफ़न में लिपटे इंसानियत को संतुष्ट कर
आगे बढ़ चले

टीवी पर देखा आज फिर से एक मंत्री शब्दों के खूबसूरत कपड़ों से
भ्रष्टाचार में सड़ते अपने जिस्म को ढकने की कोशिश कर रहा था,
और लाल-किले पर कोई गरीबी हटा कर समृद्धी लाने के वादे कर रहा था
तो कहीं कोई समाज-सेवक अनशन कर के
समाज को, इस तंत्र के विरुद्ध न कर सके
और वोटों के हिसाब-किताब में, एक नया रंग ना भर सके
इसलिए गिरफ्तार हो रहा था
हमेशा की तरह हमने अपनी नुक्ताचीनी कर दी
भ्रष्टाचार और राजनीति पर अपने ज्ञान की नुमाइश कर दी

रात हुई, सोने चल दिए
कल जल्दी उठना है
जाकर अपनी कंपनी के लिए काम करना है
ताकि पश्चिमी लोगों के जीवन को और सुलभ बना सकें
और अपनी कंपनी के लिए कुछ और डॉलर कमा सकें
सबको सन्देश भेजा
स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनायें
क्या वाकई हम स्वतंत्र हैं….?


1 Comment

अकुलाहट August 11, 2011

अकुलाहट

akulaahat

आज सुबह से सब कुछ अर्थहीन सा क्यों है,
नाखुश नहीं हूँ पर खुश भी नहीं
बोलने को शब्द तो हैं पर मन में कोई संवाद नहीं
जाने हुए से बहुत चेहरे दिखे घर से निकलने पर
पर किसी की को पहचानता हूँ, ये अहसास नहीं

घर से तो मैं रोज निकलता था एक नई शुरुआत लेकर
पर आज कुछ नया करने का वो पुराना उल्लास नहीं
इधर-उधर, ये मेरा वो उसका, यहाँ मैं वहाँ तू करके दिन तो मैंने काट लिया
लेकिन शाम होने पर जब सोचने की कोशिश की
आज मैंने क्या किया उसका कोई भी अंदाज़ नहीं

कैसा पड़ाव है ये जीवन का, मानो सब कुछ ठहर सा गया है
क्यों लगता है जैसे रोज की इस भाग दौड़ में
संबंधों और भावनाओं का अस्तित्व ही ख़त्म सा हो गया है
आंकने बैठता हूँ तो ऐसा लगता है
जैसे यह जीवन एक वृत्त की परिधी में सिमट गया है

शायद एक ककून सा बन गया है चारों तरफ
ज़िंदगी उसमे से निकलने की जी-तोड़ कोशिश करती है
और उस कोशिश में अपने कमजोर पंख फड़-फड़ाती है
और कभी जब थक जाती है तो कुछ देर चुप बैठ जाती है
लगता है जैसे उसके अन्दर ही ये ख़त्म हो जायेगी

जानता हूँ कमजोर पंखों की यह कोशिश भी एक अहम् ज़रुरत है
उस ककून से निकलने का संघर्ष ही उन पंखों को पुख्ता करता है
ताकि बाहर निकल कर ज़िंदगी एक उनमुक्त उड़ान भर सके
और दहकती धूप में भी क्षितिज की ओर, निर्भीक आगे बढ़ सके
फिर भी आज मन में यह अकुलाहट सी क्यों है

 


5 Comments

मेरी चिठ्ठियाँ July 18, 2011

मेरी चिठ्ठियाँ

meri-chiththiyaan

चिठ्ठियाँ तो मैंने तुम्हे बहुत सारी लिखी थीं
हर रात, देर तक मन के अँधेरे में छुपे हर शब्द को खोजता रहता,
और जो भी शब्द दिखाई देते
उन्हें चुनकर एक चिठ्ठी में लगा देता,
कभी-कभी जब उस अँधेरे में कोई शब्द नहीं मिलता
तो उस शब्दहीनता के अहसास को ही
उस चिठ्ठी में सजा देता,
यह सोचकर कि उस शब्दहीनता में छुपी
विवश भावनाओं को तुम पढ़ ही लोगी,
और अंत में जब चिठ्ठी पूरी हो जाती
तब भोर के सूरज की कुछ किरणें उसी में टांक देता,

हर सुबह खुद को भूल कर जब तुम्हे मिलता
तब अपने मौन में छुपाकर कर वह चिठ्ठी तुम्हे दे देता,
मैं जानता हूँ कि तुम मेरी हर चिठ्ठी को
अपनी सबसे प्रिय संदूक में सहेज कर रखती हो,
भले ही तुम अपने चेहरे पर कितनी भी शून्यता लाओ
और अपने संवादों में कितनी भी कड़वाहट भर जाओ
मुझे कोई शिकायत नहीं है,
हाँ बस इतना चाहता हूँ
कि एक दिन भोर की वो सारी किरणें जो मैंने उन चिठ्ठियों में टाँकी थीं,
मिलकर तुम्हारे लिए एक छोटा सा सूरज बन जाए
और तुम्हारे जीवन के हर अँधेरे को ख़त्म कर दें

फ़िर शाम होने पर चुपचाप अपने में लौट आता हूँ
और देर रात तक अपने मन के अँधेरे में फ़िर से शब्दों को खोजता हूँ
ताकि एक नई चिठ्ठी तुम्हे लिख सकूँ,
बस इसीलिये भूला नहीं कहलाता…


2 Comments

मैं तो चला आया मगर June 25, 2011

मैं तो चला आया मगर

main-to-chala-aaya-magar

मैं तो चला आया मगर,
तुमारे घर के परदे की सिलवटों में कुछ रह सा गया है

दीवारों पर लगी उन तस्वीरों में छपी हुई कुछ परछाईयाँ
टेबल पर रखी उन किताबों में अनपढ़े कुछ शब्द
चादर की सिलवटों के पीछे छुपी धीमी सी वो हंसी
और तकिये के नीचे दबी हुई चुप सी कुछ सिसकियाँ

किचन के फर्श पर बैठ कर की हुई कुछ ठिठोली
और शाम को चाय पर, सुनो आज ये हुआ जो तुम बोली
तवे पर सिकती रोटियों में बनाए हुए कुछ आकार
और वो खाना खाते हुए तुम्हारा कहना, बस थोडा सा और

वो सीढ़ी के पायदानों पर घंटो तक साथ में चुप बैठना
और आसमान के तारों को ये मेरा और वो तुम्हारा कह चुनना
वो अर्ध-रात्री में उठ कर तुम्हारा उंगली से हथेली पर लिख देना प्यार
और सुबह की उन अधखुली आँखों में जैसे पाया हो मैंने संसार

झील किनारे बैठ कर मूक शब्दों ने की थी जो बातें
निज जीवन सार सुनाने को अधजग सी काटी वो सब रातें
अनजान शहर के रास्तों पर वो देर रात तक पैदल चलना
हर एक मोड़ पर पहुँच कर, बस अगले मोड़ तक और, ये कहना

चलते चलते आज मैं फिर उसी मोड़ पर खड़ा हूँ
और उस अगले मोड़ को चारों तरफ खोज रहा हूँ
तुम कहीं भी नहीं हो, बस तुम्हारा अहसास है
और ये दिशाहीनता ही निरंतर मेरे साथ है

जीवन-सूत्र को सुलझाने तो चला आया मगर
उसका एक सिरा जैसे तुम्हारे घर में ही कहीं अटक सा गया है
और जीवन का मंतव्य जैसे एक अँधेरे में कहीं सिमट सा गया है


3 Comments

Circuit May 10, 2011

Circuit

circuit

Born on 4-Feb-2006, as far as my memory goes I was separated from my mother when I was 18 days old. I was first adopted by a family where I soon realised that no one wanted me around. One day two boys and a girl came to our house. Scared and so I tried to hide myself under the chair but one of the guys caught me. He kept me in his lap and kissed me. I felt really warm there and felt as if I am in my mother’s lap. The girl said – “Sir…he is so cute…we must take him with us”. And when I opened my eyes, I was in a new house where four guys lived together. (more…)


3 Comments

काश April 28, 2011

काश

kaash

काश तुम जीवन होते, हर पल तुमको जी जाता,
काश वो सपना होते तुम, जिसे रंगों से नित नहलाता मैं
काश वो दृष्टी होते तुम, जिससे ये जग सुन्दर दिखने लगे,
काश तुम छाया होते, जिसे प्रतिपल अपने संग पाता मैं

काश तुम हंसी होते, जिसे हर पल निज-अधर लगाता,
काश शब्द वो होते तुम, जिन्हें संवादों में भर पाता मैं
काश वो वायु होते तुम, जो ह्रदय में शीतलता भर दे,
काश तुम तट होते, जिससे लहर बन मिल जाता मैं

काश तुम गोद होते, जिसमे सर रख सब भूल जाता,
काश वो बारिश होते तुम, जिसमे भीग-भीग के गाता मैं
काश संगीत वो होते तुम, जो धमनियों में रच-बस जाए,
काश तुम चन्दन होते, जिसे नित निज मस्तक लगाता मैं

काश तुम पंख होते, जिसे पहन नभ-उद्यान में उड़ता फिरता,
काश वो पुस्तक होते तुम, हर पृष्ठ में स्वयं को पाता मैं
काश तुम बस वो होते जो तुम कहते थे कि तुम हो,
हर दिशा में खोजने की जगह हर दिशा संग तुम्हे पाता मैं।


3 Comments

तुम कभी तो सोचती होगी April 26, 2011

तुम कभी तो सोचती होगी

tum-kabhi-to

कांच की बंद खिड़की के पीछे
किसी अँधेरे कोने में, घुटनों में मुंह छुपाये
तुम कभी तो सोचती होगी

जो बह न सके उन अश्रुओं और उस निर्मम कटुता के पीछे
शून्य की निरंतरता में, आँखों को गड़ाये
तुम कभी तो सोचती होगी

वासनामयी कह कर, और देकर के गालियाँ मुझे
इस वासनामयी के निष्काम निरंतर स्नेह को, अपनी ही आँखों के भीतर
तुम कभी तो खोजती होगी

झूठ सच का फैसला ये जग कहाँ कर पायेगा
पर झूठ की परतों तले, दबे उस सच के धब्बे को अपनी उँगलियों से, खुद ही
तुम कभी तो कुरेदती होगी

विश्वासघाती, हृदयविहीन कह, फ़ेंक कर पाषाण मुझपर,
अपने ह्रदय से चुनकर, मेरे विश्वास के टुकड़ों को, सबसे छुपाकर, चुपके से
तुम कभी तो जोड़ती होगी

शब्दों, संवादों और इन रिश्तों के बाजारों में,
शोर गुल के बीच, एक पल के लिए ही सही, मेरे निशब्द, मूक स्नेह को
तुम कभी तो खोजती होगी

जब कभी तुम घुटनों से अपने सर को उठाओगी,
और इस भीड़ में खुद को अकेले पाओगी
तब कांच की उस खिड़की को खोलना और आँखें बंद करना,

अपनी इस वेदना में पिघल कर,
भाप बन उस कांच की खिड़की पे बिछ गया हूँ मैं
उस भाप की सुगंध को अपने अन्दर बसा लेना,

अस्तित्व मेरा निर्जीव होकर, बिखर गया उस भाप में
पर मेरा स्नेह-सुगंध अब, हर पल तुम्हारे पास रहेगा
बस उस खिड़की को खोलना और उसे अपना लेना


2 Comments

तेरा ज़िक्र
Bhelcome to Dilli
मंझधार
घुटन
माँ
टूटा हुआ सा…
दीप जलाओ
Mysore Palace
चार आने का सुकून
शायद वह एक स्वप्न था
विडम्बना
हम स्वतंत्र हैं
अकुलाहट
मेरी चिठ्ठियाँ
मैं तो चला आया मगर
Goaaaaa
Corbett National Park
Circuit
काश
तुम कभी तो सोचती होगी