तेरा ज़िक्र
आज करके तेरा ज़िक्र कोई
फ़िर सारे ज़ख्म कुरेद गया
रेशा – रेशा करके
सालों लगे जिन्हें सिलने में
एक पल में ही कोई
हर इक कतरा उधेड़ गया,
क्या कहा सुना माना जाना
सोचते इन बातों को
रात यूँ ही रोती रही
और सहर की आस में
कोने में रखी शमा
ख़ामोश सिसकती रही,
क्या तुम्हे भी कभी
मन का सियह वो कोना
रातों को कचोटता है
और अतीत की धूल तले
दबी हुई उन परतों को
कोई यूँ ही बिखेरता है,
क्या किसी सुबह अचानक उठ कर
तुम भी इस चेहरे को ज़हन से
मिटाने की कोशिश करते हो
और फ़िर अनायास ही
मेरी सलामती की दुआ करते हो
या तुमने जीना सीख लिया है?


