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September 17, 2012

तेरा ज़िक्र

आज करके तेरा ज़िक्र कोई
फ़िर सारे ज़ख्म कुरेद गया
रेशा – रेशा करके
सालों लगे जिन्हें सिलने में
एक पल में ही कोई
हर इक क़तरा उधेड़ गया

क्या कहा सुना माना जाना
सोचते इन बातों को
रात यूँ ही रोती रही
और सहर की आस में
कोने में रखी शमा
ख़ामोश सिसकती रही,

क्या तुम्हे भी कभी
मन का सियह वो कोना
रातों को कचोटता है
और अतीत की धूल तले
दबी हुई उन परतों को
कोई यूँ ही बिखेरता है,

क्या किसी सुबह अचानक उठ कर
तुम भी इस चेहरे को ज़हन से
मिटाने की कोशिश करते हो
और फ़िर अनायास ही
मेरी सलामती की दुआ करते हो
या तुमने जीना सीख लिया है?


11 Comments

  • दिल की बात बयाँ कर दी ….पूरी रचना कई-कई बार पढ़ी ….
    क्या तुम्हे भी कभी
    मन का सियह वो कोना
    रातों को कचोटता है….
    बेहद स्पर्शी,गहरी टीस !!

  • Soulful…really commendable..ek choti si koshish meri taraf se

    यूँ तो हर रात किया है मैंने ख़ामोशी से तेरा ही ज़िक्र
    फ़िर आज क्यों तेरे ज़िक्र पर मेरी आँखें भर आईं….

  • क्या किसी सुबह अचानक उठ कर
    तुम भी इस चेहरे को ज़हन से
    मिटाने की कोशिश करते हो
    और फ़िर अनायास ही
    मेरी सलामती की दुआ करते हो
    या तुमने जीना सीख लिया है?

    सच, कुछ लोग डूबे रहते हैं किसी की यादों में और कुछ लोग जीना सीख जाते हैं…बहुत सुन्दर कविता है.

  • Thnx sash for liking my small effort…belated diwali wishes 2 u n ur family..nd ofcourse Belated b’day wishes..god bless u wid all happiness nd fill d darkness of ur poems wid love and happiness

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